छत्तीसगढ़ से ओडिशा और फिर आंध्र तक गो-तस्करी का बड़ा कॉरीडोर उजागर

 


गरियाबंद/देवभोग: छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमा से जुड़े इलाकों में गो-तस्करी का बड़ा नेटवर्क सक्रिय होने का खुलासा हुआ है। पड़ताल में सामने आया है कि छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती गांवों से कम कीमत में गाय-बैल खरीदकर उन्हें ओडिशा के धरमगढ़ पशु बाजार ले जाया जाता है, जहां से आगे आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कसाईघरों तक सप्लाई की जाती है।


🌙 आधी रात सीमा पार, हर शुक्रवार लगती है मंडी

छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती जिला। यहां के देवभोग से करीब 8 किमी की दूरी तय करते ही ओडिशा लग जाता है। यहां बीजू एक्सप्रेस-वे के किनारे आधी रात गायों का झुंड लिए कुछ लोग दिखे। इतनी बड़ी संख्या मंे गाय-बछड़ों के साथ यहां क्यों बैठे हैं? सवाल पूछते ही सकपका गए। बताया, धरमगढ़ जा रहे हैं इन्हें बेचने। बाकी सच्चाई पड़ताल में खुली। ऐसा हर हफ्ते शुक्रवार को होता है। पता चला कि ये गायों के साथ रात में छत्तीसगढ़ की सीमा पार कर लेते हैं। देवभोग से लगे ओडिशा के धरमगढ़ में हर शुक्रवार इनकी मंडी लगती है। फिर शुरू होता है आंध्रप्रदेश और तेलंगाना तक का सफर, जहां के कसाईघरों में इन गायों की सप्लाई होती है। इस नेटवर्क में दलाल, मजदूर और स्थानीय सिस्टम की भूमिका संदेह के घेरे में है।

शिक्षा, स्वास्थ्य हो या अन्य सुविधाएं, आधा जिला ओडिशा पर आश्रित है। इन सबके अलावा गो-तस्करी के लिए भी गरियाबंद और ओडिशा के सीमावर्ती जिले कालाहांडी में जबरदस्त तालमेल बैठा हुआ है। देवभोग से करीब 15 किमी दूर ओडिशा के धरमगढ़ में बीफ के लिए बड़े पैमाने पर गायों का सौदा होता है। हर हफ्ते शुक्रवार को लगने वाले इस बाजार में हर सप्ताह 5000 से ज्यादा गाय-बैल बिक जाते हैं।छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों से भी यहां गायें लाई जाती हैं।यहां के 90% मवेशियों की सप्लाई ओडिशा के रास्ते आंध्रप्रदेश के कसाईघरों में होती है। इतना होने के बावजूद न तो छत्तीसगढ़ सीमा पर कोई कार्रवाई होती है और न ही ओडिशा में।  


🐄 गांव-गांव घूमकर खरीदते हैं मवेशी

ओडिशा के कालाहांडी जिले का धरमगढ़ स्थित मवेशियों की सबसे बड़ी मंडी है। छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे एजेंट गांव-गांव में घूम-घूमकर 1000 से 1500 रुपए में मवेशी खरीदते हैं। हर गांव से 10-20 गाय-बैल खरीदकर शुक्रवार को उन्हें बेचने के बहाने धरमगढ़ पशु बाजार में बुलाते हैं। बेचने वाले को पहले ही पैसा दे दिया जाता है। इस तरह एक एजेंट हर सप्ताह 50 से 100 गायों का सौदा करता है। मवेशी मंडी के बाहर खड़ी एजेंटों की महंगी गाड़ियां बताती हैं कि भीतर के खरीदार किसान नहीं, इनके एजेंट हैं।
एक मवेशी खरीदें या 100, शुल्क सिर्फ 100 रुपए : धरमगढ़ के मंडी में नियमों के मुताबिक बिकने वाले पशुओं को ले जाने के लिए 100 रुपए की रसीद कटानी पड़ती है। चाहे एक मवेशी खरीदें या 100... शुल्क के तौर पर 100 रुपए ही देना पड़ता है। दलाल गांव के लोगों से पहले ही खरीद चुके मवेशियों को बाजार में लेकर आते हैं और यहां सौदा होना बताते हैं। दलाल के दूसरे आदमी सभी मवेशियों को एक झुंड में कर उन्हें शुल्क चुकाते हुए बाजार ले जाते हैं। मंडी के कर्मचारियों को पता रहता है कि ये गाय-बैल किसान या गांव वाले नहीं, बल्कि गो-तस्कर खरीद रहे हैं। 
अधिकतर सप्लाई गरियाबंद से: मंडी के कर्मचारियों ने बताया कि यहां छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से ही मवेशी बेचने लाए जाते हैं। वहां के कुछ खरीदार भी आते हैं। उन्हें हिंदी में बात करते सुनकर समझ जाते हैं कि ये छत्तीसगढ़ से हैं। मवेशियों का सौदा कर वे उन्हें इसी रास्ते से आंध्र ले जाते हैं। कुछ साल पहले तक महासमुंद-पिथौरा होते हुए उन्हें दूसरे राज्यों में भिजवाया जाता था। पकड़े जाने के डर से अब ऐसा नहीं करते।हर शुक्रवार बाजार, आधी रात पार करते हैं सीमा 
    

🚶 पैदल कराते हैं सीमा पार

गो-तस्करी का यह नेटवर्क चरणबद्ध तरीके से काम करता है।

पहला चरण:

  • कालाहांडी की सीमा: मवेशियों को बाजार से वाहनों में नहीं ले जाते। इसके बजाय उन्हें पैदल हांकते हुए चरणबद्ध तरीके से सीमा पार कराते हैं। इसके लिए ट्रेंड मजदूर लगाए जाते हैं। लगभग 40-50 मवेशियों के पीछे चार मजदूर चलते हैं। इनका काम मवेशियों को चराते हुए कालाहांडी सीमा तक जाना होता है।  
  • इसके एवज में प्रति मवेशी करीब 500 रुपए तक खर्च आता है। मजदूरों ने नाम नहीं बताया, लेकिन यह बताया कि उनकी जिम्मेदारी मवेशियों को कालाहांडी सीमा पार कराने तक है। पहला पड़ाव कालाहांडी के आमपानी थाना क्षेत्र से होकर नवरंगपुर मार्ग की घाटियों को पार करते हुए बीरीमाल तक माना जाता है। यहां पहली टीम की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है।  

दूसरा चरण:

दूसरा चरण नवरंगपुर से शुरू होकर कोरापुट तक चलता है। पूरा नेटवर्क ऐसे तैयार किया है कि साप्ताहिक बाजार से निकले मवेशियों को तीन दिनों के भीतर आंध्र सीमा तक पहुंचा दिया जाए। बूढ़े और अधमरे मवेशियों को मेटाडोर जैसे हल्के वाहनों से ले जाया जाता है।

📊 6 साल में सिर्फ 21 केस

गो तस्करी रोकना पुलिस या किसी भी विभाग की प्राथमिकता में नहीं रहता। यही वजह है कि अधिकतर वे ही मामले दर्ज होते हैं, जो संगठन या युवा पुलिस के संज्ञान में लाते हैं। गो-तस्करी के गढ़ गरियाबंद जिले में 2020 से अप्रैल 2026 तक यानी 6 साल से भी अधिक समय में मवेशी तस्करी के महज 21 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 52 लोगों की गिरफ्तारी हुई। सर्वाधिक 8 केस में 20 गिरफ्तारियां पिछले साल हुईं।गरियाबंद जिले से मवेशियों की तस्करी होने जैसी कोई जानकारी फिलहाल मुझे नहीं है। अगर ऐसा है तो इस बारे में जानकारी जुटाएंगे। आवश्यक कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित अफसरों को दिशा-निर्देश भी दिए जाएंगे। - भगवान सिंह उइके, कलेक्टर, गरियाबंद

Source- Dainik Bhaskar

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